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साकिब आजमी
आजमगढ़। आजमगढ़ जिले के निजामाबाद के सपा विधायक आलमबदी आजमी का वादा जुमला ही साबित हुआ। इसे लेकर ईमानदार छबि के इस सपा विधायक की काफी किरकिरी हो रही है और लोग उनके कार्यों पर अंगुलियां उठाना शुरू कर दिये हैं। यह मामला निजामाबाद विधानसभा क्षेत्र के शिवराजपुर गांव का है। इस गांव में पुल न होने के कारण लोगों को काफी दुश्वारियां हो रही थी। पुल के लिए इलाके के लोग शासन-सत्ता से लेकर जनप्रतिनिधियों के दरवाजे तक अपना दुखड़ा रोते रह गये मगर कहीं पर भी उनकी सुनवाई नहीं हुई। ऐसी स्थिति में लोगों ने जनसहयोग से करोड़ों की लागत का यह पुल खड़ा कर दिया। दो वर्षों से यह पुल जर्जर अवस्था में पहुंचा हुआ है। दोनों ओर की ज्वाइंटर सड़क पूरी तरह से धंस चुकी है। ऐसे में लोग अधिकारियों से लेकर सभी जनप्रतिनिधियों तक गये मगर कहीं कोई उनका दर्द समझने वाला नहीं था। पिछले वर्ष बरसात के दौरान क्षेत्रीय सपा विधायक आलमबदी आजमी गांव में पहुंचे तो पुल की बदहाली देखकर लोगों से वादा किया कि वह शीघ्र ही इसे दुरूस्त करा देंगे। पिछला बरसात तो पार ही हुआ, देखते-देखते एक बरस गुजर गया, इस साल की भी बरसात सामने आ गयी और लोगों की दिक्कतें बढ़ गयी हैं, बावजूद इसके पुल की जर्जरता जस की तस पड़ी हुई है। अब तो लोग सपा विधायक आलमबदी आजमी की ओर अंगुलियां भी उठाने लगे हैं और कहने लगे हैं कि निजामाबाद के विधायक का वादा सिर्फ जुमला ही साबित हुआ। इस इलाके के संभ्रान्त लोगों में मौलाना खालिद, जौवाद अहमद, शहबाज बीडीसी, मौलाना सरफराज, आदिल आजमी, इमरान अहमद आदि का कहना है कि उन लोगों को सियासी लोग केवल वोटबैंक समझते हैं और वोट ले लेने के बाद पांच वर्ष तक उनके दुख-दर्द से किसी तरह का कोई सरोकार नहीं रखते हैं। चुनाव आता है तो फिर घड़ियाली आंसू बहाने चले आते हैं। इन लोगों का कहना है कि इस बार चुनाव आयेगा तो वह लोग इन सियासी लोगों को बतायेंगे।

शिवराजपुर का पुल है, गंवई एकता की मिसाल
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शिवराजपुर गांव में करोड़ों रूपये की लागत से जनसहयोग से बना यह पुल वास्तविक रूप से गंवई एकता की मिसाल है। इस पुल के न होने के कारण लोगों को बाजार जाने के लिए कई किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता था। पुल बना तो लोगों का सफर आसान हो गया। दिक्कतें दूर हो गयी। इस पुल के निर्माण में इलाके के लोगों ने दिल खोलकर सहयोग दिया। किसी ने यह नहीं देखा कि वह अधिक पैसे खर्च कर रहा है और फलां आदमी कम सहयोग दे रहा है। यहां तक कि गांव के तमाम लोग ऐसे रहे, जो आर्थिक रूप से सहयोग देने में सक्षम नहीं थे। ऐसे में उन लोगों ने श्रमदान के जरिये ही अपना योगदान दिया। साथ ही जिन लोगों ने बड़ी आर्थिक मदद दी, वह लोग भी श्रमदान देते वक्त जरा भी नहीं झिझके। सब मिलाकर यह पुल गंवई एकता की मिसाल है। जाति-धर्म से परे हटकर, इलाके के हर किसी का इस पुल के साथ दिली जुड़ाव है। आखिर क्यों नहीं होगा, इसको खड़ा करने के लिए सभी अपने सामथ्र्य के साथ खड़े हुए थे।