संदीप अस्थाना
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आजमगढ़। साझी विरासत आजमगढ़ की तासीर है। यहां हमेशा हिन्दू-मुस्लिम मिल-जुलकर एकता व अखण्डता के गीत गाते रहे हैं। इसी का परिणाम रहा है कि यहां पर कभी धार्मिक दंगे नहीं हुए। देश के सिखों ने जब उबाल खाया था तो भी इस जिले का सिख खामोशी से साथ-साथ रहा था और जब इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद इस देश के सिखों पर कहर बरपाया गया तो भी इस जिले का सिख पूरी तरह से सुरक्षित रहा था। जबकि इस जिले में सिखों की भी एक बड़ी जमात है और सिख समुदाय का ऐतिहासिक चरणपादुका गुरूद्वारा इस जिले के निजामाबाद कस्बे में स्थित है। इसी तरह से अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद जब पूरी दुनियां में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए और इन दंगों में दोनों समुदायों के तमाम लोग मारे गये तथा तमाम मंदिर व मस्जिद तोड़ दिये गये, उस वक्त भी इस जिले में दोनों समुदायों के बीच हल्की सी टकराहट भी नहीं हुई। नब्बे के दशक में शहर के शिब्ली नेशनल पीजी कालेेज में बन्देमातरम कोे लेकर दोनों समुदाय के छात्रों के बीच तनाव की स्थिति बनी मगर बड़े लोगों ने हस्तक्षेप करके मामला शांत करा दिया। उसी दौरान मामूली बात को लेकर जिले के मुबारकपुर कस्बे में शिया-सुन्नी के बीच मामूली बात को लेकर एक के बाद एक लगातार तीन दंगे हुए। असलियत सबको पता है कि यह दंगा धार्मिक दंगा नहीं था। मुस्लिम समुदाय के दो अलग विचारधाराओं के लोगों के बीच आपसी झगड़े को लेकर यह दंगा फैला था। साथ ही इस दंगे ने रेशमनगरी के नाम से पहचाने जाने वाले मुबारकपुर को पूरी तरह से बर्बाद करके रख दिया। विश्वविख्यात बनारसी साड़ियां बनाने वाले इस जिले के मुबारकपुर कस्बे के हथकरघा उद्योग से जुड़े जो व्यापारी दिखावा के लिए सिगरेट में सौ व पांच सौ रूपये का नोट लपेटकर पिया करते थे, वह रोटी-रोजी को मोहताज हो गये। फिलहाल इस जिले की माटी में ऐसा कुछ खास तो है ही, जो महर्षि दुर्वासा, महर्षि दत्तात्रेय, चन्द्रमा ऋषि जैसे महामुनियोें ने इस जिले को अपनी तपोस्थली के लिए चुना। यहीं पर महाराज जन्मेजय ने सर्पयज्ञ किया। इसी जिले के भैरो स्थान पर भगवान भोले शंकर की पत्नी सती के पिता दक्ष ने महायज्ञ रचाया और अपमान होने के कारण उसी हवनकुण्ड में कूदकर मां सती भस्म हुई। यहां की माटी में कुछ खास होने का ही असर है कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन, अयोध्या प्रसाद उपाध्याय हरिऔध, पं श्यामनारायण पाण्डेय, पं लक्ष्मीनारायण मिश्र, कैैफी आजमी, अल्लामा शिब्ली नोमानी जैसी विभूतियां यहीं पर पैदा हुई। सब मिलाकर यहां की माटी में हमेशा ही अमन का गीत गाया गया है और आज भी यहां के लोग वही गीत गाते चले जा रहे हैं।

हिन्दू करता है मस्जिद की हिफाजत
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आजमगढ़ जिले में कई मस्जिद ऐसे हैं, जिनकी हिफाजत हिन्दू समुदाय के लोग करते हैं। शहर के सिविल लाइन इलाके के नगर पालिका चैराहे से भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष स्व श्यामबहादुर सिंह के मकान की ओर जाने वाले मार्ग को ही ले लीजिए, इस मस्जिद के ठीक पीछे स्व श्यामबहादुर सिंह का मकान है। चारो तरफ से हिन्दू आबादी के बीच घिरी हुई हैै यह मस्जिद। इस मस्जिद के 400 मीटर के दायरे में एक भी मुसलमान का मकान नहीं है। बावजूद इसके मस्जिद पर मौलवी रहते हैं। वह जुमा की नमाज पढ़ाते हैं। आस-पास के दुकानदार, राहगीर, कलेक्टरी कचहरी के वादकारी आदि यहां आकर नमाज अता करते हैं। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष का मकान होने के कारण यहां भाजपाइयों का आना-जाना बराबर लगा रहता है। मुख्यमंत्री रहते कल्याण सिंह भी यहां आये थे। अयोध्या का ढांचा भी विघ्वंस हुआ। बावजूद इसके इस मस्जिद पर कभी खरोंच तक नहीं आयी। इसी तरह से शहर से सटे परानापुर में जिले के अधिकांश बड़े नेताओं ने अपना आलीशान मकान बनवा लिया है। शहर के धनाड्य लोग भी यहीं मकान बनवाकर रहते हैं। परानापुर में जहां पर मस्जिद स्थित है, उसके डेढ़ किमी की आबादी के बीच केवल दो मुस्लिम परिवार रहता है। यह दोनों मुस्लिम परिवार और यह मस्जिद हमेशा, हर परिस्थिति में सुरक्षित रही है।

मुस्लिम आबादी के बीच सुरक्षित है मंदिर
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इस जिले में मुस्लिम आबादी के बीच कई मंदिर हैं। यह मंदिर हमेशा सुरक्षित थे और आज भी पूरी तरह से सुरक्षित हैं। शहर के कुरैशिया कालेज के दोनों तरफ मुस्लिम आबादी के बीच स्थित मंदिर हमेशा महफूज रहा है। शहर के टेढ़िया मस्जिद के पास से निकली गली में मुस्लिम आबादी के बीच एक मुस्लिम के मकान से सटकर मौजूद राधाकृष्ण मंदिर में हर रोज पूजा-पाठ होती है। इस इलाके में हिन्दू परिवार न के बराबर हैं। बावजूद इसके इस मंदिर को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। इसी तरह से शहर के जालन्धरी व तकिया मुहल्ले में मुस्लिम आबादी के बीच हिन्दू देवी-देवताओं के कई मंदिर मौजूद हैं और कभी इन मंदिरों पर खरोंच नहीं आयी, न ही इन मंदिरों में जाने वाले श्रद्धालुओं से कोई विवाद हुआ।

एक ही परिसर में मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा
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आजमगढ़ शहर में एक ही परिसर में मंदिर, मस्जिद व गुरूदारा स्थित है। आमजन की आस्था का प्रतीक यह पवित्र धर्मस्थलियोें का संगम शहर के बिट्ठलघाट पर स्थित है। यहां हिन्दू पूजा-पाठ व मुसलमान नमाज अता करते हैं। साथ ही सिख समुदाय के लोग अपना धार्मिक क्रियाकलाप करते रहते हैं। खण्डहर हो चुके यह स्थल कब और किसने बनवाया, इसका कोई रिकार्ड किसी के पास नहीं है। फिलहाल यह तय है कि सैकड़ों वर्ष पहले किसी समुदाय के किसी एक ही व्यक्ति ने इसका निर्माण कराया होगा। धार्मिक एकता का प्रतीक यह स्थल इस जिलेे की सोच व तहजीब का जीता-जागता उदाहरण है। समाज के हर तबके के लोगों को चाहिए कि वह इसका संरक्षण व जीर्णोद्धार करें।

दुर्गा पूजा कमेटियों में होते हैं मुसलमान
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जिले में कई ऐसी दुर्गा पूजा कमेटियां हैं, जिनमें मुसलमान सक्रिय सदस्य व पदाधिकारी हैं। यह मुसलमान दशहरा के मौके पर बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और खुलकर चन्दा भी देते हैं। कलेक्टरी चैराहे पर जो दुर्गा पूजा कमेटी थी, उसमें कुमार साव, बाढ़ू साव व युनूस मियां ही प्रमुख थे। युनूस मियां वर्षों इस कमेटी के अध्यक्ष रहे। इन लोगों के बूढ़ा हो जाने और इसके कई सक्रिय सदस्यों का निधन हो जाने के कारण कुछ वर्षों से यह पूजा पण्डाल नहीं बन रहा है। इसी तरह से जिले के रानी की सराय कस्बे की सबसे अग्रणी दुर्गा पूजा कमेटी आजाद दल के अबू तालिब उर्फ मुन्ना भाई वर्षों तक पदाधिकारी रहे। वह बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका का निर्वहन करते थे। अपने समय के पदाधिकारियों व सदस्यों के निष्क्रिय हो जाने व उम्र अधिक होे जाने के कारण अब उतना समय नहीं दे पाते हैं। वह कहते हैं कि हिन्दू-मुसलमान के बीच विवाद कहां है। हम सब तोे एक ही गुलशन के फूल हैं। विवाद तो नेता अपने राजनैतिक फायदे के लिए पैदा करते हैं। दोनों समुदाय का आम आदमी तो हमेशा सकून से रहना चाहता है।

हिन्दू रखता है रोजा, मुस्लिम महिलायें करवा चैथ
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इस जिले में ऐसे हिन्दुओं की कोई कमी नहीं है जोे रमजान के महीने में रोजा रखते हैं। इसके साथ ही कई ऐसी मुस्लिम महिलायें हैं, जो अपने पति की लम्बी उम्र के लिए करवा चैथ का व्रत रखती हैं। शहर के सिधारी मुहल्ले की रहने वाली एक मुस्लिम महिला का कहना है कि वह लम्बे समय से करवा चैथ का व्रत रख रही हैं। इससे उनको आत्मसंतुष्टि मिलती है। इसके साथ ही वह हर धनतेरस को हिन्दुओं की तरह से खरीददारी करना नहीं भूलती। धनतेरस पर वह चांदी केे सिक्केे खरीदती हैं।