सूरज राय
आजमगढ़। यूं तो मरने के लिए जहर सभी पीते हैं, जिन्दगी तेरे लिए जहर पिया है मैंने। खलील-उर रहमान की ये लाइनें आजमगढ़ जिले में श्रमदान व आमजन के सहयोग से कई पुल बनवाकर लोगों के दिलों को जोड़ने वाले शकील तोवां व बीबी का जेवर गिरवी रखकर पुल बनवाने वाले फिनिहिनी गांव के बेचू चैहान सहित उन सारे लोगों पर सटीक बैठती है जिन्होंने इस नेक काम का बीड़ा उठाया। इतिहास गवाह है कि जब भी कोई नेक काम करता है, आम आदमी के लिए जीता है तो उस पर अंगुलियां उठायी जाती है। इन लोगों पर भी अंगुलियां उठी। आरोप-प्रत्यारोप लगे मगर यह लोग आम आदमी के लिए सब सह गये और विचलित नहीं हुए। उसी का परिणाम है कि सरकारी फण्ड को धता बताते हुए लोगों ने जनसहयोग से आजमगढ़ में कई पुल खड़ा कर दिया। आज स्थिति यह है कि इनमें से अधिकांश पुल जर्जर हो चुके हैं, मगर इनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं है। सरकार और जनप्रतिनिधि तो जिस तरह से पुल के निर्माण के दौरान चुप्पी साधे हुए थे, ठीक उसी तरह से वह आज पुल के मरम्मत के नाम पर भी चुप हैं।
आजमगढ़ जनपद के निजामाबाद तहसील क्षेत्र के शिवराजपुर गांव में भी जनसहयोग से इसी तरह का एक पुल बनवाया गया है। तमसा नदी पर बना यह पुल आज टूटने के कगार पर है। शिवराजपुर, मदारपुर, केवटाडीह आदि गांवों को जोड़ने वाले इस पुल को गांव के लोगों द्वारा खून पसीना बहाकर बनाया गया है। इसमें सरकार का एक पैसा भी नहीं लगा है। पुल के दोनों तरफ जो रास्ता बनाने के लिए दीवाल बनायी गयी है वो फट चुकी है। एक तरफ की गिर भी चुकी है। किसी दिन बड़ा हादसा भी हो सकता है। ऐसे में तीनों गांव का आवागमन बाधित हो सकता है। सब मिलाकर शिवराजपुर गांव में वर्ष 2007 में श्रमदान से बना यह पुल पूरी तरह से खस्ताहाल हो गया है। श्रमदान व जनसहयोग से यह पुल शकील तोवां ने बनवाया था। इस पुल को बनाने में सबसे बड़ा आर्थिक सहयोग इसी जिले के रहने वाले वापी, गुजरात के प्रमुख उद्योगपति रहे मरहूम इसरारूल हक साहब ने दिया था। शिवराजपुर के बूढ़े, जवान व बच्चे सभी इस पुल के निर्माण को लेकर काफी उत्साहित थे और हर कोई तन, मन, धन से अपना सहयोग दिया था। हर किसी के अंदर बस एक ही जज्बा था कि जल्द से जल्द पुल बनकर तैयार हो जाय। हाजी अख्तर अली, मरहूम सज्जाद अहमद, मरहूम डा सैफुल्लाह साहब, अब्दुल बहाव, मुहिद्दीन, यूसुफ, शब्बीर अहमद पुल का निर्माण शुरू होने से लेकर काम खत्म न होने तक लोगों का हौसला अफजाई करते हुए जो जिस लायक था उससे वह सहयोग करने की अपील कर रहे थे। आज जब यह पुल टूटने के कगार पर है तो शिवराजपुर और उसके आस-पास की हर आंख उदास है। सभी पुल को निहार रहे हैं मगर किसी विधायक, सांसद व अधिकारी को आम आदमी की उदासी और उसके जज्बात से कोई लेना-देना नहीं दिख रहा है। इसी तरह से शकील तोवां के नेतृत्व में श्रमदान व जनसहयोग से जिले में जो भी दर्जन भर पुल बनवाये गये हैं, वह सभी जर्जर हो गये हैं। इन जर्जर हो चुके पुलों की मरम्मत करवाने वाला कोई नहीं है। सरकार व अधिकारी तो चुप हैं। शायद आमजन को भी पुल बनवाने वाले शकील तोवां से मरम्मत की भी आस है।
बीबी का जेवर गिरवी रखकर पुल बनवाये थे, अब मरम्मत भी करवाये
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पुल बनवाने के लिए बीबी का जेवर गिरवी रख दिया था। समाज के लिए यह जीवट का काम किया था आजमगढ़ जिले के फिनिहिनी गांव निवासी बेचू चैहान ने। वजह यह रहा कि फिनिहिनी गांव में ही बेचू के पिता रामू चैहान ने अपने पैसे से पुल बनवाया था। यह पुल पूरी तरह से जर्जर हो चुका था। ऐसे में अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए बेचू ने उसी जगह पर सात पावे का पुल बनवा दिया। आज जबकि यह पुल जर्जर हो चुका था और कोई इसकी मरम्मत कराने वाला नहीं रहा तो बेचू ने अपना लाखों रूपया खर्च करके इसकी मरम्मत करवा दिया।
आजमगढ़ जिले के मेहनगर तहसील क्षेत्र में गाजीपुर जिले के बार्डर पर एक छोटा सा गांव है फिनिहिनी। बार्डर का गांव होने के कारण यह आज भी उपेक्षित है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस इलाके के लोग बुनियादी समस्याओं से जूझते कभी भी देखे जा सकते है। देश की आजादी के बाद से लेकर अब तक स्थितियां एक समान हैं। स्थितियां यह थी कि शेरपुर कुटी- बोंगरिया मार्ग पर स्थित इस गांव में 40 साल पहले कोई पुल नहीं था। ऐसे में इस इलाके के लोगों को तैरकर नदी पार करना पड़ता था। बरसात के दिनों में बाढ़ के पानी से जब नदी उफान पर होती थी तो लोगों की काफी फजीहत होती थी। बाढ़ के पानी में डूबकर अकसर ही जिन्दगियां थम जाया करती थी। इस इलाके के लोगों ने उस समय तमाम जनप्रतिनिधियों से संपर्क साधा। यहां तक कि इस जिले के रहने वाले रामनरेश यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में इसी जिले के मो. मसूद खां पीडब्लूडी मिनिस्टर थे, लोग उनसे भी मिले। बावजूद इसके हर जगह यहां के लोगों को बस आश्वासनों की ही घुट्टी पिलायी गयी। ऐसी स्थिति में इस इलाके के लोगों ने जनप्रतिनिधियों से पुल मिलने की आस छोड़ दी। फिनिहिनी गांव के रहने वाले रामू चैहान ने तो 40 साल पहले बगैर किसी स्वार्थ के समाज के लिए जो कदम उठाया, वह अविस्मरणीय है तथा आज के तथाकथित समाजसेवी ऐसा करने के बारे में सोचेंगे भी नहीं। वजह यह कि उन्होंने अपने दम पर इस पुल को बनाने का संकल्प लिया। अपने संकल्प को पूर्ण करने के लिए वह गांव के ही रहने वाले सीता पाण्डेय से सात बिस्वा जमीन की रजिस्ट्री करवाये और उस जमीन को पुल को जोडने वाले रास्ते के लिए दे दिया। साथ ही पुल का निर्माण कार्य पूर्ण करा दिया। सात पावे का बना यह पुल दर्जनों गांवों को जोड़ता था तथा प्रतिदिन इस पुल से हजारों लोग गुजरते थे। एक दशक पहले यह पुल पूरी तरह से जर्जर हो चुका था। ऐसे में लोग जनप्रतिनिधियों से मिले। हर चुनाव में नेताओं ने इस इलाके के लोगों से इस पुल को बनवाने का वादा किया। यह अलग बात है कि चुनाव बाद हर नेता वादा भूल गया। ऐसे में इस पुल को बनवाने वाले स्व. रामू चैहान के बेटे बेचू चैहान ने अपने पैसे से इस पुल का निर्माण शुरू करा दिया। पुल के निर्माण के दौरान पैसों की कमी पड़ी तो एक लाख रूपये में पत्नी का जेवर गिरवी रख दिया। फिलहाल तमाम दुश्वारियों के साथ सात पावे का पुल बनकर तैयार हो गया। इस काम के लिए बेचू ने किसी से एक रूपये की मदद भी नहीं ली।
धंसे पुल से गिरी कार तो करा दिया पुर्ननिर्माण
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फिनिहिनी गांव स्थित इस जर्जर हो चुके पुल के अचानक डेढ़ दशक पहले धंस जाने की वजह से एक कार गिर गयी। इसे कुदरत की माया ही कही जायेगी कि कुछ ही नीचे जाकर कार अटक गयी। कार में आधा दर्जन लोग सवार थे। यदि कार नीचे गिरती तो शायद उस पर सवार कोई व्यक्ति जीवित नहीं बचता। टूटे पुल के सरिये में कार के अटक जाने के बाद गांव के लोग जुटे। ग्रामवासी बेचू चैहान ने क्रेन, ट्रैक्टर आदि मंगाकर कार को खिंचवाया और उसी दिन अपने पिता द्वारा बनवाये गये इस पुल के पुर्ननिर्माण का संकल्प लिया। कुछ ही दिनों में उनका संकल्प पूरा हो गया और पुल बनकर तैयार हो गया। मौजूदा समय में यह पुल फिर जर्जर हो चुका था। इस बरसात के शुरू में इस पुल से चलना काफी मुश्किल था। यही वजह रही कि बरसात में आमजन की दिक्कतों को देखते हुए अपना लाखों रूपया खर्च करके उन्होंने इस पुल की मरम्मत करवा दी।
कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं
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अपने गांव व इलाके के लिए इतना सब कुछ करने के पीछे बेचू की कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं है। वह अपना ईंट भट्ठा चलाने के साथ अपने पिता के नाम पर परसूपुर दौलताबाद गांव में श्री रामू चैहान प्राथमिक विद्यालय चला रहे हैं।
समाज के लिए कुछ न करे तो जीवन का अर्थ क्या
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फिनिहिनी गांव के बेचू चैहान का कहना है कि समाज के लिए कुछ न करे तो जीवन का अर्थ ही क्या है। उनका कहना है कि सुन्दर मकान बनाने से क्या फायदा, उससे समाज तो लाभान्वित नहीं होता है।  बेचू कहते हैं कि यह पुल मेरे लिए किसी मंदिर से कम नहीं है। उनका कहना है उनके पिता द्वारा बनवाया गया यह पुल उनके लिए एक धरोहर है। वह इसका अस्तित्व खत्म नहीं होने देंगे। बेचू कहते हैं कि समाजसेवा की प्रेरणा उनको अपने पिता से मिली है। वह अभी समाज के लिए कर ही क्या पाये हैं। बेचू कहते हैं कि अपने लिए तो सभी जीते हैं मगर अपने लिए जीना भी क्या जीना है। ऐसी जिन्दगी तो जानवर भी जी लेते हैं। दूसरों के लिए जिन्दगी जीने वाले लोग ही सही मायने में इंसान कहलाने के काबिल होते हैं।
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