SANDEEP ASTHANA
आजमगढ़। मिरी दुनियां मिरे ही गांव के मुखिया ने लूटी है, कहां जाऊं ठिकाना मेरा चम्बल लिख दिया जाये….। बेकल उत्साही के इन शब्दों में मुबारकपुर के दर्द को उकेरा जा सकता है। एक दौर वह भी था जब मुबारकपुर में एक ओर धनवर्षा होती थी तो दूसरी ओर ज्ञान की गंगा बहती थी। यहां की शौर्य गाथा आज भी लोग गाते नहीं थकते हैं। यह अलग बात है कि अब सब कुछ बदल गया है। जाने किसकी नजर लगी कि रेशम नगरी के नाम से पहचाना जाने वाला यह कस्बा पूरी तरह से बर्बाद हो गया। इसके लिए यहीं के लोगों को निश्चित रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। शासन-सत्ता भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। यहां के लोगों ने अपने दर्द की दास्तां अनगिनत बार सुनायी, मगर इनकी आवाज या तो सुनी नहीं गयी या फिर सुनकर अनसुनी कर दी गयी। ऐसे में यहां के लोग आज यह कहने को मजबूर हैं कि मेरी आवाज गूंगी है या तेरे कान बहरे हैं।
 
मुबारकपुर में ही बनती हैं बनारसी साडिय़ां
—————————
विश्व पटल पर ख्यातिलब्ध बनारसी साडिय़ां आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर कस्बे में ही बुनी जाती हैं। वाराणसी के नाम का बस ठप्पा भर लग जाता है। रेशमी साडिय़ों के कारोबार ने इस छोटे से कस्बे को मिनी दुबई बना दिया था। नब्बे के दशक तक यह कस्बा रेशमी साडिय़ों का बहुत बड़ा हब हुआ करता था। मुबारकपुर के आस-पास की सभी जातियों की आबादी यहां बुनकरी करने आती थी। मुसलमान जुलाहों के अतिरिक्त गरीब क्षत्रिय, ब्राह्मïण, चमार, कहार आदि भी यहां बुनकरी करते थे। बिहार और बंगाल के कामगार भी यहां बुनकरी करने आते थे। यहां लगभग 25 हजार घरों में 75 हजार हथकरघे चलते थे। यहां की बनी साडिय़ां एजेंटों के माध्यम से देश के दूसरे हिस्सों और अन्तर्राष्टï्रीय बाजार में भेजी जाती थी। बुनकरी से लाखों परिवार में खुशियां थी, अमन और बरकत थी। सुफियाने गीतों की आवाज और खटर-पटर करते करघों के बीच रेंगती बुनकरों की उंगलियां ही यहां का मंजर हुआ करती थी। इस व्यवसाय से प्रत्यक्ष और परोक्ष जुड़े सभी हिन्दू-मुस्लिम आबादी का यही जीवन आधार था। हंसते-खेलते इस पूरी आबादी और इनके व्यवसाय पर न जाने किसकी नजर लग गई। सन् २००० में मुबारकपुर में शिया-सुन्नी के बीच तीन दंगे क्या हुये, लाखों घरों के चूल्हे बुझ गये। लोगों की गृहस्थी उजड़ गयी। इस दंगे में दो दर्जन की संख्या में शिया-सुन्नी मारे गये।
मुबारकपुर में ही सबसे पहले इस्तेमाल हुआ साकेट बम
————————————
देश में सबसे पहले साकेट बम का इस्तेमाल मुबारकपुर में ही किया गया। इस साकेट बम का इस्तेमाल वर्ष 2000 में हुए यहां के दंगे के दौरान किया गया। इस दंगे के बाद मुबारकपुर का साड़ी व्यवसाय ऐसा मरा कि सरकार की संजीवनी भी इसे जिला नहीं सकी। व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा में सूरत और गुजरात के पावरलूमों की एडवांस तकनीक से बनी सस्ती साडिय़ों के आगे मुबारकपुर पीछे होता गया और सरकार की उपेक्षा ने इसे मृतप्राय बना दिया। लिहाजा हिन्दू बुनकर क्या, पुश्तैनी जुलाहे भी रोजी-रोटी को मोहताज हो गये और एक आबाद आबादी व्यवसायिक रूप से अभिशप्त हो गयी। हजारों हथकरघे व लूम बन्द हो गये। ये करघे क्या बन्द हुए, यहां की जिन्दगी ही बन्द हो गयी। लोग जीना ही भूल गये, यहां की जिन्दगी कुछ ठहर सी गयी। गरीबी की खाई बढ़ती गयी और महंगाई आसमान छूती गयी।
दूसरे देशों के छात्र भी पढऩे आते हैं मुबारकपुर
——————————
मुबारकपुर कस्बे में स्थित अलजामे अतुल अशरफिया मकरजी संस्था में पढऩे के लिए इसी देश के कोने-कोने से नहीं बल्कि विदेशों से भी मुस्लिम छात्र आते हैं। इस शिक्षण संस्थान का काफी महत्व भी है। हांलाकि आतंकी गतिविधियों में इस जिले का नाम आने के बाद बाहर से यहां अध्ययन के लिए आने वाले छात्रों की संख्या में काफी गिरावट आयी है।
मुबारकपुर के मो. शोएब थे पाक के पहले वित्तमंत्री
——————————
अब मुबारकपुर नगर पालिका में शामिल कर लिया गया घनी आबादी वाला गांव अमिलो गाजीपुर के गहमर के बाद पूर्वांचल का सबसे बड़ा गांव था। इसी अमिलो के मूल निवासी मो. शोएब भारत-पाक बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गये और वहां के पहले प्रधानमंत्री मो. जिन्ना के मंत्रिमण्डल में प्रथम वित्तमंत्री बने। १९५५ के बाद मो. शोएब पाकिस्तान से अमेरिका चले गये और वहां विश्व बैंक के चेयरमैन बने। उनकी लड़की नफीसा सादिक पाकिस्तान की हेल्थ सेक्रेटरी रहीं। जो बाद में संयुक्त राष्टï्र जनसंख्या कोष की कार्यकारी  निदेशक और संयुक्त राष्टï्रसंघ की उपसचिव बनी। वे अपने समय की प्रथम महिला थी जो इस महत्वपूर्ण पद पर पहुंची। वह  सेवानिवृत्त के बाद संयुक्त राष्टï्र संघ के महासचिव की सलाहकार भी बनी।
जीवित मुर्दों का संगठन मुबारकपुर से ही उपजा
——————————
जीवित मुर्दों के संगठन मृतक संघ की उपज मुबारकपुर से ही हुई। जीवित मुर्दो की संघर्ष का पर्याय बने लालबिहारी मृतक यहीं के रहने वाले हैं। जब वह कागजों में मृत घोषित कर दिये गये तो खुद को जिन्दा साबित करने के लिए उन्होंने लम्बी लड़ाई लड़ी। खुद को जिन्दा साबित किया। उनकी लड़ाई यहीं पर खत्म नहीं हुई। वह कागजों में मार दिये गये लोगों की लड़ाई अपने संगठन मृतक संघ के बैनर तले लड़ रहे हैं तथा हजारों लोगों को अब तक जिन्दा करा चुके हैं। निश्चित रूप से लालबिहारी मृतक कागजों में मार दिये गये लोगों के लिए प्रेरणास्रोत ही हैं।
मुबारकपुर में ही जन्में थे कथाकार प्रभुनाथ
————————–
मुबारकपुर से ही सटे पिचरी गांव के जन्मे देश के वरिष्ठï साहित्यकार प्रभुनाथ सिंह आजमी के कहानियों में इस पूरे परिक्षेत्र के ग्रामीण जीवन का दर्शन होता है। उनके कहानियों के पात्र इन्हीं गांवों में संघर्ष करते दिखायी पड़ते हैं। स्व. आजमी कथाकार थे। उन्होंने भोपाल में रहकर साहित्य की अगाध साधना की और वर्ष 2013 में इस धरा धाम को अलविदा कह गये।
कभी असलहे के कारण तो आज करैली के कारण सुर्खियों में है रज्जब अली का गांव
—————————————————
मुबारकपुर से सटा हाजीपुर बम्हौर गांव है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नायक रज्जब अली का गांव है यह। तीन जून 1857 को जब यहां के क्रांतिकारियों ने इस जिले को आजाद करा दिया था, उसी समय कई अंग्रेज अफसरों को रज्जब अली ने मार डाला और जेल का फाटक तोड़कर अपने क्रांतिकारी साथियों को आजाद करा दिया। बाद में जब जिले पर अंग्रेजों ने फिर कब्जा जमाया तो रज्जब अली को पकड़ लिया और उन्हें कई टुकड़ों में काट डाला। क्रांतिकारी रज्जब अली का यह गांव पिछले कई दशकों से राष्टï्रीय और अन्र्तराष्टï्रीय सुर्खियों में है। पहली बार मशहूर गायक एवं टी सीरिज के निर्माता गुलशन कुमार की हत्या के बाद यह गांव सुर्खियों में आया। वजह यह कि उनकी हत्या में इसी गांव का बना कट्टïा इस्तेमाल किया गया था। उस कट्टïे पर मेड इन बम्हौर लिखा हुआ था। इस घटना के बाद इस गांव के असलहे की डिमांड और बढ़ गयी। मौजूदा समय में यह गांव मायावती सरकार के कैबिनेट मंत्री रहे चन्द्रदेव राम यादव करैली के कारण सुर्खियों में है। श्री यादव माया सरकार में लघु उद्योग और निर्यात प्रोत्साहन मंत्री थे और उनके गांव में ही देशी असलहों का कुटीर उद्योग धड़ल्ले से तब भी चलता था और आज भी चल रहा है।  पूर्व मंत्री जी का यहां एजूकेशन हब भी है। पूरे जनपद में शायद ही ऐसी इमारत एवं शैक्षिक संस्था हो। मंत्री जी की शुरूआत करैली की खेती से होती है। तब मंत्री जी सब्जी की खेती किराये  की जमीन पर करते और उसे मंडी में बेचते  थे। करैली की खेती ने इनको इनके नाम के आगे एक उपनाम करैली जोड़ दिया। मंत्री जी ने बसपा सरकार में अप्रत्याशित चल-अचल सम्पत्तियां अर्जित की।  मंत्री जी ने यहां के लोगों को शराब और शिक्षा समान रूप से बेची और बेचने वालों को संरक्षण दिया। उन्होंने माया सरकार में अपने विभाग के अनुरूप ही जहां अवैध धंधों का न केवल लघु उद्योग स्थापित होने दिया बल्कि उनके निर्यात को भी भरपूर प्रोत्साहन दिया और बदले में दिनों रात अपनी चल-अचल सम्पत्तियां बढाते गये। यही कारण है कि जेल गये और अब लम्बा आश्रय देने के लिए जेल की दीवारें उन्हें पुकार रही हैं।
shanti group