UDAY BHAN GOND
जगत जननी मां पार्वती ने सती के रूप में आजमगढ़ में ही हवनकुण्ड में कूदकर अपनी जान दी थी। आजमगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर महराजगंज विकास खण्ड में स्थित यह स्थान मौजूदा समय में वीरभद्र भैरोधाम के नाम से जाना जाता है। इसी स्थान पर दक्ष ने यज्ञ किया था। उस यज्ञ में भगवान भोले शंकर एवं सती को आमंत्रित नहीं किया गया था। बावजूद इसके सती ने भगवान भोले शंकर से यज्ञ में शामिल होने के लिए जिद किया। भगवान भोले शंकर ने खुद जाने से इंकार करते हुए माता सती को भी सलाह दी कि वह भी बिना बुलाये न जायें। मायका प्रेम के कारण माता सती ने जिद कर ली कि वह जरूर जायेंगी। ऐसी स्थिति में महादेव को यह कहना ही पड़ा कि अगर वह बिना बुलावे के जाना चाहती हैं तो वह उनको रोकेंगे भी नहीं, मगर यह जरूर कहेंगे कि यह ठीक नहीं है। फिलहाल महादेव के विरोध न करने के कारण मां सती उस यज्ञ में चली गयी। महादेव ने अपने गणों को उनके साथ जरूर भेजा।
महादेव को अपमानित करने के लिए ही किया गया था इस यज्ञ का आयोजन
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राजा दक्ष ने महादेव को अपमानित करने के लिए ही इस यज्ञ का आयोजन किया था। यही वजह थी कि इस यज्ञ में महादेव को निमंत्रित नहीं किया गया।
बावजूद इसके भवानी जब दक्ष के घर पहुंची तो दक्ष के डर से किसी ने उनकी आवभगत नहीं की। दक्ष ने भी उनका समाचार तक नहीं पूछा। यज्ञशाला में सती को शिवजी के लिये कोई भाग दिखाई नहीं दिया। तब शिव जी की कही हुई बातें उनकी समझ में आ गयी। उनका ह्दय पति अपमान के दुख से जल उठा। उन्होंने सभी सभासदों मुनिश्वरों से क्रोधित होकर कहा कि जिन लोगों ने शिव जी की निन्दा की है या सुनी है उन सब को उसका फल तुरन्त ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी पछतायेंगे। इसके बाद यज्ञ कुण्ड में कूद कर सती ने प्राण त्याग दिया।
… और कुपित हो गये महादेव
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यज्ञकुण्ड में कूदकर मां सती के जान दे देने का  समाचार जब शिवजी को ज्ञात हुआ तो शिव जी क्रोधित हो गये। उन्होंने अपनी जटा की एक लट तोड़कर चुटकी में मसलकर धरती पर पटक दिया जिससे दैत्याकार वीरभद्र उत्पन्न हुए। वीरभद्र सैनिकों को साथ लेकर यज्ञ स्थल पर पहुंचे और सभी देवताओं तथा ऋषि मुनियों को उनके कृत्य के अनुसार दण्डित किया तथा दक्ष प्रजापति का सिर धड़ से अलग कर हवन कुण्ड में डाल दिया। बाद में दक्ष की पत्नी की याचना पर शंकर जी ने शल्य क्रिया द्वारा दक्ष के सिर के स्थान पर बकरे का सिर जोड़कर दक्ष को जीवित किया। शंकर जी सती के बिछोह को सहन नहीं कर पाए और सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर उठा कर यत्र तत्र विचरण करने लगे । उनके इस प्रकार से शव को लेकर भटकने से अन्य देवताओं को काफी चिन्ता होने लगी। किसी के भी समझाने पर वह आत्म संयम नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में  विष्णु भगवान ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के छोटे-छोटे टुकड़े काटने शुरू कर दिये। सती के शरीर के छोटे-छोटे टुकड़े कट-कट कर धरती पर यत्र तत्र गिरने लगे। विष्णु भगवान ने शव के 108 टुकड़े कर सती के शव समाप्त कर दिये। तब शंकर जी का मोह भंग हुआ। वह 108 टुकड़े जिस स्थान पर गिरे यह सारे स्थान शक्ति पीठ बन गये जो भारत भर में श्रद्धालुओं के आस्था के केन्द्र है। इसमें एक स्थान स्थान आजमगढ़ में मां पाल्हमेश्वरी धाम, पड़ोसी जिले जौनपुर में मां चौकिया धाम एवं मिर्जापुर जिले में मां विन्ध्यवासिनी धाम स्थित है।
शक्ति पीठों का मूल है वीरभद्र भैरो धाम
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आजमगढ़ जिले के महराजगंज में स्थित भैरोधाम शक्ति पीठों का मूल है। यहां प्रत्येक पूर्णिमा को लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिये पहुंचते है। इसके साथ ही प्रत्येक मंगलवार को यहां दर्शन-पूजन के लिए जिले से ही नहीं वरन गैर जनपदों से हजारों की संख्या में श्रद्घालु आते हैं। मान्यता यह है कि यहां पर मांगी गयी हर मुराद जरूर पूरी होती है।  भैरोधाम  में शिव के अंश वीरभद्र का मंदिर है। यहां पर एक हवन कुण्ड विद्यमान है, जिसके सम्बन्ध में बताया जाता है कि हमेशा हवन होते रहने पर भी वह आज तक भरा नहीं है। दक्ष के यज्ञ संचालक तथा उनके प्रिय भ्राता दैत्यगुरू शुक्राचार्य के पिता महर्षि भृगु का आश्रम समीपवर्ती जिला बलिया शहर में स्थित है।
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