ASHOK SRIVASTAVA
तुम क्या पियोगे चूमकर रख दो लबों से जाम, तस्लीम यह शराब है कितनों को पी गयी। यह लाइनें निश्चित रूप से शराब की सच्चाई को बयां करती हैं। शराब कब किसकी अपनी हुई है। यह तो कितने राजघरानों को निगल गयी। ऐसे में भला आम आदमी की क्या बिसात है। शराब की बेवफाई को आजमगढ़ ने कईयों बार जिया है। यह जहर जो पीकर मर गये, वो तो मर ही गये, मगर उसके बाद की त्रासदी क्या रही, इसे आजमगढ़ बखूबी महसूस किया है। इस जहर को पीकर मरने वालों के साथ कितने बचपन मर गये। कितने अजन्मे बच्चे कोख में ही अनाथ हो गये। कितनों के बुढ़ापे की लाठी टूट गयी तो कितने घरों में चिराग जलाने वाले भी नहीं रहे। जिनके मांग का सिन्दूर धुल गयी, उनकी पथराई आंखों में अब कोई सतरंगी सपने नहीं तैरते हैं। सिर से बाप का साया उठने के बाद बैग वाले हाथों में अगर भीख का कटोरा आ गया या उनके नसीब में मजदूरी लिख दिया गया तो आखिर उसका जिम्मेदार कौन है। शासन-सत्ता ने भी दो आंख ही किया। अभी हाल ही में रौनापार व जीयनपुर में जहरीली शराब पीकर मरने वाले करीब तीन दर्जन लोगों में से 21 को शराब से मौत होना मानकर प्रदेश की सरकार ने उनके आश्रितों को सवा दो-सवा दो लाख रूपये का आर्थिक सहयोग दिया है मगर वर्ष 2013 में मुबारकपुर इलाके में जो 46 लोग जहरीली शराब पीकर मर गये, उनके आश्रितों को फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई। मुबारकपुर में जो लोग मरे थे, वह किस हाल में थे और आज उनके परिजन किस हाल में हैं, इसकी मुकम्मल पड़ताल…।
 
मुबारकपुर इलाके का आदमपुर गांव
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आदमपुर प्राइमरी पाठशाला से आगे गांव में घुसते ही रोड से दाहिने ओर मोती चौहान पुत्र लक्खन चौहान का घर है। मोती चौहान की बेवा सुराती देवी घर के बाहर बैठी पथराई आखों से आने-जाने वालों को निहार रही थी। जहरीली शराब ने सुराती से उसकी जिन्दगी, उसका पति ही छीन लिया था। 55-60 साल के मोती चौहान के तीन लड़के हैं। तीनों गारामाटी का काम करते हैं, जमीन के नाम पर कुल पांच बिस्वा की काश्तकारी है। आर्थिक सहयोग के बाबत पूछने पर उसकी आंखों में आंसू थरथराने लगे। बोली कुछ भी नहीं, बस ना में सिर हिला दिया। इसी गांव के दक्षिणी हिस्से में घुरभारी उर्फ घूरे चौहान का घर है। वही घूरे चौहान जिसे पुलिस ने अवैध शराब का कारोबारी बताया था। इस घर से कुल तीन लाशें उठी थी। तीन ही थे, तीनों मर गये। घूरे पाउच बेचता था यह बात सही है, लेकिन वह शराब का कारोबारी नहीं था। ईट पर ईंट रखकर खड़ी की गयी आड़ और उस पर टिन की छत जिसमें मौके पर भैंस बंधी थी, आसपास के लोगों ने बताया कि यहीं घूरे की शराब की दुकान थीं। असल बात यह कि घूरे को खुद पीने की लत थी, यही खर्च निकालने के लिए वह आस-पास के लोगों को दस-बीस पाउच बेचकर स्वयं के लिए एक-दो पाउच का जुगाड़ कर लेता था। घूरे की पत्नी रोते हुये बताती है कि इस गांव में जहरीली शराब से पहली मौत गोपाल की हुई। गोपाल पुत्र लोचन चौहान उम्र 34 वर्ष की मौत की खबर सुनते ही ये घबराने लगे थे, कहने लगे कि मेरी आंख से कम दिखाई दे रहा है। मैंने कहा जा अऊर पी आवा। लड़का मुबारकपुर सरकारी अस्पताल में ले गया । डाक्टर ने कहा, ठीक है ले जाओ। रात में अधिकारी आये, वह जिला अस्पताल ले गये वहां से बनारस भेज दिये। रास्ते में ही मौत हो गयी। कहने लगी, पीयत त रोज रहलैं, बहुत मने करत रहली, कबो-कबो झगड़ा कर लेत रहनी, छोट-छोट पाउच ले आवत रहन, दस रूपया का। वही बतायी पड़ोस के गांव नरावं से बिकने के लिए आती थी यह शराब। गोपाल की पत्नी उमरायी की उम्र 36-37 वर्ष के आस-पास है। पांच बच्चियां सुषमा, प्रतिमा, रेशमा, सीमा, करिश्मा और तीन बेटे हिमांशु, अमन व छोटू । छोटू पेट में था जब गोपाल को शराब निगल गयी। उमरायी की आंखों में अभी भी सारे दृश्य तरोताजा हैं। जरा सा कुरेदने पर फूट पड़ती है। रोते-रोते बताती है, पीकर आये तो हमने सोचा रोज की तरह ही पीकर आये होंगे। कुछ घंटों बाद अचानक कहने लगे अंखिया से न लउकत हव। दौडऩा धूपना शुरू किया। अस्पताल लेकर गये लेकिन कुछ भी हाथ न लगा। पुतली अंदर घुस गयी थी। रोशनी गायब हो गयी थी। सिर पीट रहे थे। सिर पकड़ कर घूम रहे थे। कह रहे थे बहुत शराब पी लेकिन ऐसी नहीं। आज क्या हो गया दीवार पकड़ कर रोते थे। होठ, आंख सब करिया हो गया था। पूरा शरीर काला पड़ता जा रहा था। कुछ ही देर बाद छटपटाते-छटपटाते सो गये, फिर कभी नहीं उठे। वह बढ़ईगिरी करते थे, सब पी जाते थे। कुछ नहीं छोड़ा। रामप्यारे पुत्र विश्वनाथ उम्र 35 वर्ष सहित आदमपुर में कुल आठ लोग शराब के शिकार हुये थे। इनमें से केवल तीन का ही पोस्टमार्टम हुआ था। गांव के लोग बताते हैं कि प्रशासन ने घटना को दबाने की पूरी कोशिश की। लाशों को जल्दी दफनाने-फूंकने के लिए दबाव बनाया। यह शराब आती कहां से थी, के जबाव में अधिकांश ने नरांव का नाम लिया। कुछ एक जानकार लोग मुलायम का नाम लिये। घूरे की वेवा भी कह रही थी केरमा क मुलायमा के इहां से नरांव , नरांव से जगह-जगह भेजि जात रहल इ जहर। घूरे के बड़े लड़के का नाम शास्त्री उम्र 42 वर्ष था। घूरे के सात बच्चे थे। पांच लड़कियां, दो लड़के। छोटा बेटा संजय 35 वर्ष का था। संजय की तीन लड़की और एक लड़का है। घूरे, शास्त्री और संजय तीनों मर गये थे। कोई दाग देने वाला नहीं बचा था। पहले बूढ़े पिता के प्राण निकले फिर नौजवान पुत्रों के। गांव वाले मानते हैं दोनों की गलती थी। पीने वालों की भी और पिलाने वाले की भी। गांव में ही बिकने के कारण उधारबारी लेकर भी पी लेते थे लोग। बाजार या ठेके से पीने के लिए नकद चाहिए होता है।
आदमपुर के पूर्व ग्राम प्रधान जंगबहादुर चौहान बताते हैं कि मेहनत, मजदूरी और खेती बारी ही गांव के लोगों की आजीविका का जरिया है। तीन हजार के आसपास के आबादी वाले इस गांव में आधा दर्जन लोग सरकारी नौकरी में हैं। गांव में चौहान और मुसलमान आबादी है। एक घर जायसवाल परिवार भी है। २००६-०७ में आदमपुर को निर्मल ग्राम पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। घर-घर बनवाये गये शौचालय दिखते भी हैं। स्वच्छता का राष्टï्रीय पुरस्कार और शिक्षा में इतना पीछे पूछने पर वह बताते हैं कि कभी २०० लूम चलते थे इस गांव में। काम-धंधे की कोई कमी नहीं थी। हमेशा बुनाई चलती रहती थी। ऐसे में सब लोग कमाने में लग गये। पढ़ाई लिखाई नहीं किये। लेकिन एक तूफान आया और सब खत्म हो गया। कैसा तूफान के सवाल पर कहने लगे, फैशन का तूफान, हम जो बनाते थे उसे बाजार ने नकार दिया। अब गांव में एक भी लूम नहीं है। तब बहुत खुशहाली थी अब कुछ लोगों ने पढऩा-लिखना शुरू किया है।
अतरडीहा गांव में एक ही परिवार से उठी थी चार अर्थी
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मुबारकपुर के अतरडीहा गांव में एक ही परिवार से चार अर्थी उठी थी। जीरा उम्र 50 वर्ष पुत्र दौलत, मुरारी उम्र 55 वर्ष पुत्र पुत्र दौलत, उमेश उम्र 22 वर्ष पुत्र मुरारी व फौजदार पुत्र मोती को जहरीली शराब निगल गयी थी। उमेश अविवाहित था। मुरारी के चार बच्चे हैं। वह मजदूरी करके सबका पेट पालता था। फौजदार के तीन लड़कियां व चार लड़के हैं। वह वाराणसी में साड़ी बुनाई का काम करता था। दशहरा मनाने गांव आया हुआ था। तीन लड़कियों व दो लड़कों का पिता जीरा बगल के गांव में स्थित ईंट के भ_ïे पर ईंट पाथने का काम करता था। गांव वाले बताते हैं कि इन सभी के पोस्टमार्टम के लिए भी जाम लगाना पड़ा था। इसके अलावा इस गांव में जहरीली शराब से तीन अन्य लोगों की भी मौत हुई थी। इनमें राजकुमार उम्र 20 वर्ष पुत्र सीता, राजेन्द्र उम्र 55 वर्ष पुत्र मीनू राजभर व रामजनम उम्र 40 वर्ष पुत्र रामदत्त शामिल थे। पति के मरने के कारण 20 साल के राजकुमार की पत्नी परमी 60 साल की बुढिय़ा नजर आ रही है। सबसे बुरा हाल रामजनम के परिवार का है। सात बच्चे हैं। पत्नी गीता कहती है, खेती-बारी कुछ भी नहीं है। एक बेला खाती है तो दो बेला उपवास। बच्चे ननिहाल में रहते हैं। घर में बेहद गरीबी का आलम है। गांववालों के भरोसे किसी तरह जीवन की गाड़ी खींच रही है।
मुबारकपुर का प्यारेपुर चकिया गांव
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मुबारकपुर इलाके का प्यारेपुर चकिया गांव। यहां जहरीली शराब से दो लोगों की मौत हुई थी। इन दोनों में शिवबचन राजभर पुत्र दुब्बर व राजकुमार राजभर पुत्र बल्ली राजभर शामिल थे। दोनों की उम्र 45 वर्ष के लगभग की थी। शिवबचन गारा-माटी करता था। खेती-बारी के नाम पर कुछ भी नहीं। वह अपनी बेवा उर्मिला के ऊपर पांच लड़कियों व एक लड़के के परवरिश की जिम्मेदारी छोड़ गया। उसका दुख भी औरों की तरह ही गाढ़ा है। राजकुमार की बेवा कमली की कहानी भी इनसे कुछ अलग नहीं है। तीन लड़की व तीन लड़के हैं। कहने लगी अपने त सिधरी की नाईं उलटि गइलैं, परिवार कैसे चली, इ भी ना सोचलैं।
त्रासदी से अछूता नहीं रहा नरांव भी
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मुबारकपुर इलाके के दर्जन भर से अधिक गांव के लोगों में मौत बांटने वाला नरांव गांव खुद भी इस त्रासदी से अछूता नहीं रहा था। कुल चार मौतें हुई थी इस गांव में। पहली मौत अधिराज चौहान उम्र 55 वर्ष पुत्र मुनेश्वर चौहान की हुई थी। तीन लड़कियां व तीन लड़कों का पिता था वह। मजदूरी करके परिवार का पेट पालता था। दूसरी मौत छ_ïू उम्र 50 वर्ष पुत्र पिल्लू चौहान की हुई। उसके चार लड़कियां व एक लड़का है। वह भी गारा-माटी करके परिवार चला रहा था। रामबली चौहान पुत्र बिजुल चौहान की उम्र अभी 18 साल ही थी। विवाह नहीं हुआ था। उसे लेकर मां-बाप ने कितने सपने देखे थे। सब रेत के घरौंदे की तरह एक झोंके में उड़ गये।  बाबूलाल का बेटा फौजदार 22 साल का था। हादसे के एक साल पहले ही उसकी शादी हुई थी। बाबूलाल गांव में ही चाय की दुकान चला रहे थे और फौजदार फर्नीचर का काम सीख रहा था। सब खत्म हो गया। फौजदार की मौत ने बाबूलाल की कमर ही तोड़ दी। शराब माफियाओं का गांव होने के कारण मौत के बाद भी उनके परिजनों को शराब माफियाओं की ज्यादती का शिकार होना पड़ा। मौत की घटना को दबाने-छुपाने के लिए इन शराब माफियाओं ने आनन-फानन में मृतकों का शव फुंकवा दिया। पोस्टमार्टम भी नहीं होने दिये। इसके अलावा इस गांव में एक मौत जनार्दन की भी हुई थी। वह इस गांव का दामाद और मृत रामबली का जीजा था। जनार्दन चालीसवां गांव का रहने वाला था। रामबली की बूढ़ी मां की आंखों के आंसू अभी तक नहीं सूखे हैं। अभागन ने एक ही झटके में अपना बेटा व दामाद दोनों खो दिया था।
मुबारकपुर का ओझौली गांव
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ओझौली का त्रिभुवन उम्र 55 वर्ष पुत्र हरदेव चार लड़की व दो लड़कों का पिता था। घर में करघे थे। पूरा परिवार करघे पर काम करता था। सब मिलाकर खाता-पीता परिवार था। उसने किसी ठीहे पर बैठकर शराब नहीं पी थी। उसने रोज की तरह घर पर लाकर शराब पी थी। त्रिभुवन की बेवा विद्यावती बताती है कि, कहने लगे कि आज की शराब का स्वाद बहुत कड़वा है। कल उसे डांटना पड़ेगा कि अब ऐसी शराब मत देना। कहते-कहते वह पति की स्मृतियों में खो गयी। कहने लगी…खुद ही चले गये…सब कुछ छोड़कर…किसी से शिकायत क्या करेंगे। इसी गांव के महेन्द्र पुत्र केरा अपने घर के बरामदे में चारपाई पर लेटा था। शराब ने उसकी आंखों से रोशनी छीन लिया है। महेन्द्र की तीन लड़कियां व दो लड़के हैं। आंखें थी तो ठेला चलाकर सबका पेट पालता था। अब कैसे चल रहा है, के सवाल पर उदास व गहरे दर्द में डूब जाता है। कहता है, मालिक हैं, वही सब देख रहे हैं…। कुछ देर शांत रहने के बाद रूंआसा होकर कहता है…कहने को तो सात सगे भाई हैं, सब अलग-अलग रहते हैं, कभी चवन्नी की भी मदद नहीं की। घटना के बाद विधायक मरने वालों के घर पहुंचे थे, उनके परिजनों को पांच-पांच हजार रूपये की मदद दिये, इस जिन्दा लाश को वह भी नहीं पूछे। मोहन उम्र 32 वर्ष पुत्र पवारू गोड़ को भी यह जहरीली शराब लील गयी। उसके परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा व दो बेटियां हैं। वह मजदूरी करके परिवार का पेट पालता था, अब यह जिम्मेदारी उसकी पत्नी पर आ गयी है। इसी गांव का रामदयाल राजभर शराब बेचता था। वह और उसके इकलौते बेटे प्रकाश ने साथ ही दारू पिया। दोनों मर गये। प्रकाश के तीनों बहनों की शादी हो चुकी है। अब घर पर दोनों विधवा सास-बहू ही एक दूसरे का आंसू पोंछने के लिए रह गयी हैं। इसके अलावा गरीबी के साथ-साथ घर में प्रकाश के दो छोटे बेटे व एक बेटी भी है। गरीबी के कारण सास-बहू मजदूरी व गोबर पाथने का काम करती हैं।
इसके अलावा भी कई गांव के लोग चढ़े शराब की भेंट
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कौडिय़ा गांव के मनोज उम्र 50 वर्ष पुत्र रघुवीर राम, गड़ेरूआ गांव के जालन्धर उम्र 32 वर्ष पुत्र मोतीलाल व मोतीलाल उम्र 55 वर्ष पुत्र मरछू, अमिलो भगतपुरा के राजेन्द्र राम उम्र 45 वर्ष पुत्र जीतन राम की इहलीला भी शराब के भेंट चढ़ गयी। अमिलो भरउटी के मंगल पटवा उम्र 55 वर्ष पुत्र शिवनाथ पटवा ठेला चलाते थे। वह अकसर ही गांव के बाहर बने शिवमंदिर पर सो जाते थे। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था। मंदिर पर सोने वाले दूसरे लोगों ने उसके परिवार वालों को बताया था कि भयानक पीड़ा हुई थी उसे। मंदिर का पिलर कसकर पकड़ लिया था पीड़ा के कारण। शरीर ऐंठ गया। तड़प-तड़पकर प्राण निकले थे उसके। मंदिर पर सोने का कारण पूछने पर मंगल की बहू बताने लगी कि घर में जगह ही कहां थी। उन दोनों बहुओं के लिए ईंट की दीवार बनाकर किसी तरह टिनशेड डाले थे। ऐसे-तैसे मुश्किल से परिवार का खर्च चल जा रहा था। चकिया गांव के दुक्खी उम्र 50 वर्ष पुत्र घुरहू को भी शराब लील गयी। दो लड़कियां व दो लड़के हैं। दोनों लड़के अब मुम्बई में रहकर मजदूरी करने लगे हैं। आजादनगर के मोहम्मद मुबीन उम्र 60 वर्ष पुत्र अब्दुल मजीद व देवली के मोहम्मद रजा उर्फ ताऊ उम्र 45 वर्ष पुत्र मोहम्मद ताहिर भी यही जहरीली शराब पीकर मर गये। दोनों के पांच-पांच संतानें हैं और दोनों ही मजदूरी करके परिवार का पेट पालते थे। रजा के मौत के समय उसकी पत्नी पेट से थी। बाद में बेटा हुआ। देवली गांव के मजदूर मोहम्मद मारूफ उम्र 60 वर्ष पुत्र जग्गी की जिन्दगी भी शराब निगल गयी। इसके अलावा लोहरा सहित मुबारकपुर इलाके के कई अन्य गांवों में भी इस शराब ने नरबलि ली। सब मिलाकर जहरीली शराब पीकर मरने वाले मजदूर तबके के थे और आज उनके आश्रित मुफलिसी की जिन्दगी जी रहे हैं। बावजूद इसके अब तक की सरकारें मौन रही हैं और इनको मदद के नाम पर फूटी कौड़ी भी नहीं मिल सकी है।
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