आजमगढ़। सरकारी उपेक्षा के कारण गांव-गली के अखाड़े बन्द हो गये। इसके साथ ही गरीब परिवार एक पहलवान का खान-खर्च नहीं उठा पाती। इसकी वजह से भी कुश्ती के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है। हाल यह कि देश को ख्यातिलब्ध पहलवान देने वाले आजमगढ़ के लोग भी कुश्ती से दूर होते चले जा रहे हैं।
एक समय वह भी रहा है, जब आजमगढ़ में पहलवानों की फौज हुआ करती थी। यहां तक कि जब रैंकिंग नहीं तय की जाती थी और लोग यह नहीं जानते थे कि राष्टï्रीय व अन्र्तराष्टï्रीय पहलवान का खिताब कैसे मिलता है,उस समय आजमगढ़ के पहलवानों से हाथ मिलाने की कूबत किसी में नहीं हुआ करता था। ऐसे पहलवानों में सुखदेव पहलवान का नाम लिया जा सकता है। वह आज भी जिले के पहलवानों के आदर्श हैं। आजमगढ़ भी हमेशा अपने इन पहलवानों का सम्मान किया है। सुखदेव पहलवान के नाम पर आजमगढ़ का एक तिराहा है और वहां पर उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गयी है। इसके अलावा भी इस जिले की माटी में जन्में अन्र्तराष्टï्रीय पहलवानों में ताल्लुकदार यादव, आनन्द शंकर यादव, बालचन्द यादव, अमलेश यादव, इन्द्रजीत यादव एवं राष्टï्रीय पहलवानों में खरपत्तू यादव, ज्ञानशंकर यादव, भैय्यालाल, सत्यवान यादव, प्रवीण यादव आदि रहे हैं। नये पहलवानों में रोहण यादव, वीरभद्र चौहान, धर्मवीर राजभर, संजय यादव, अभिमन्यु यादव, रामचन्दर यादव आदि राष्टï्रीय फलक पर इस जिले का नाम रोशन किये हुए हैं।
एक समय वह भी था, जब गांव-गली में अखाड़े चला करते थे। जो पहलवान जिले में अव्वल हो जाता था वह राष्टï्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाता था। वो दिन शायद लद चुके हैं। अब पूरे जिले में बमुश्किल आधा दर्जन अखाड़े ही रह गये हैं। इस समय जिले में जो अखाड़े चल रहे हैं उनमें बौरहवा बाबा अखाड़ा पल्हनी, कदमघाट अखाड़ा, नीबी अखाड़ा, चड़ई अखाड़ा, देवारा अखाड़ा आदि शामिल है। ऐसा नहीं है कि अब इस जिले में प्रतिभाओं की कमी हो गयी है वरन सरकारी उपेक्षा के कारण कुश्ती-दंगल के प्रति लोगों का रूझान कम हो गया है। राष्टï्रीय पहलवान रहे भैय्यालाल कहते हैं कि पहले मिट्टïी पर कुश्ती होती थी। अब गद्दे पर कुश्ती हो रही है। हमारे यहां मिट्टïी में प्रैक्टिश करने वाले लड़के गद्दे की कुश्ती में फेल हो जा रहे हैं। कइयों बार जनप्रतिनिधियों से गद्दे की मांग की गयी। उन्होंने बस कोरा आश्वासन ही दिया। गद्दे पर कुश्ती की प्रैक्टिस कराने के लिए एक अखाड़े को 72 अन्र्तराष्टï्रीय मानक के गद्दे की जरूरत पड़ती है। इस 72 गद्दे की कीमत करीब चार लाख रुपये पड़ेगी। सही रख-रखाव पर यह गद्दे कम से कम दस साल चलेंगे। बावजूद इसके सरकार बंदोबस्त नहीं कर पा रही है। साथ ही पहलवानों का खुराक ज्यादा और मंहगा होता है, जो गरीब मां-बाप नहीं वहन कर पाते हैं। यही वजह है कि लोग इस विधा से दूर होते जा रहे हैं।
स्टेडियम के कोच राधेश्याम यादव ने कहा कि सरकार 6 माह कोचिंग चलाकर बंद कर देती है। सोचती है 6 माह में ही हम ओलम्पिक विजेता दे दें। ऐसा भला कैसे संभव है। ओलम्पिक विजेता देने में कम से कम दस साल नियमित कोचिंग चलानी पड़ेगी और कड़ी मशक्कत करनी होगी।
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